श्रीहनुमान चालिसा
Friday, January 1, 2010
Hanuman Bhajan
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दोहा
श्रीगुरु चरण सरोज रज निजमनु मुकुल सुधारि।
वरनऊ रघुवर विमल यश जो दायक फल चारि।
बुध्दिहीन तनु जानि के, सुमिरों पवन कुमार।
बल बुध्दि विद्या देहु मोहि हरहु कलेस विकार॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपींस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित चल धामा।
अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुवेसा।
कानन कुंडल कुंचित कैसा॥
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनैऊ साजै॥
संकर सुवन केसरी नन्दन।
तेज प्रताप महा जग बन्दान॥
विद्यावान गुनी अति चातुर।
विद्यामान काज करिवे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।
विकट रुप धरी लंक जरावा॥
भीम रुप धरी असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज सवारे॥
लाय संजीवन लषन जियाये।
श्री रघुवीर हरपि उर लाये॥
रघुपति किन्ही बहुत बडाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हारो जस गावें।
अस कहि श्रीपती कंठ कंठ लगावें॥
सनकादिक ब्रह्मादिक मुनीसा।
नारद सारद सहित अहिसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहां ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहि किन्हा।
राम मिलाय राज पद दिन्हा॥
तुम्हारो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मोलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हारे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहु को डरना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाक ते कांपै॥
भुत पिसाच निकट नहीं आवें।
महावीर जब नाम सुनावें॥
नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमंत बल बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै।
मन क्रम बचन ध्याण जो लावें॥
सब पर रां तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
तासु अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग प्रताप तुम्हारा।
है परसिध्द जगत उजियारा॥
साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिध्दी नौ निधी के दाता।
अस वर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दु:ख बिसरावै॥
अन्त काल रघुवर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमंत सेई सर्व सुख करई॥
संकट कैंट मिटै सब पिरा।
जो सुमिरे हनुमंत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरू देव की नाई॥
जो सतबार पाठ कर जोई।
छुटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढैं हनुमान चालिसा।
होय सिध्दी, साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजे नाथ हृदय मंह डेरा॥
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लषन सीता सहित, हृदय बेसहु सुर भूप॥
॥इति श्री हनुमान चालिसा संपुर्ण॥
Shiv Bhajan
शिव चालीसा
दोहा : जय गणेश गिरिजा सुवन , मंगल मूल सुजान
कहत अयोध्यादास तुम , देव अभय वरदान
जय गिरिजापति दीनदयाला , सदा करत संतन प्रतिपाला
भाल चंद्रमा सोहत नीके , कानन कुंडल नाग फनी के
अंग गौर शिर गैंग बहाए , मुंडमाल तन छार लगाये
वस्त खाल वादाम्भर सोहे, छबी को देखि नाग मुनि मोहे जय गिरिजापति...
मेंना मातु कि हवे दुलारी, वाम अंग सोहत छबी न्यारी
कर त्रिशूल सोहत छबी भारी, करत सदा शत्रून श्य्कारी
नदिं गन सोहे तह कैसे , सागर मध्य कमल है जैसे
कार्तिक श्याम और गंराऊ , या छबि को कही जात का काऊ जय गिरिजापति...
देवन जभी जाए पुकारा , तबही दुःख प्रभु आप निवारा
किया उपद्रो तारक भारी , देवन सब मिली तुमहि जुहारी
तुरत पशानन आप पठायो , लो निमेश मह मार गिरयो
आप जलंधर असुर संहारा , सुयुश तुम्हार विदित संसारा जय गिरिजापति...
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई , सबहि कृपा कर लीन बचाई
किया तपहि भगीरथ भारी , पुर प्रतिज्ञा तासु पुरारी
दानिन मह तुम सम कोई नाही , सेवक स्तुति करत सदाही
वेध माही महिमा तब गाई , अखत अनादी भेद नही पाई जय गिरिजापति...
प्रगति उदधि मथन ते ज्वाला , जरत सुरासुर भई विहला
किंह दया तह कर सहाई , नीलकंठ तब नाम कहाई
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा , जीत के लंक विभीषण दीन्हा
सहस कमल में हों रहे धारी , किंह परीक्षा तबहि पुरारी
एक कमल प्रभु राखउ गोई , कमल नयन पूजन चह सोई
कठिन भक्ति देखि प्रभु शंकर , भय प्रशन दिए एत्चित वर
जय जय जय अनंत अविनाशी , करत कृपा सब के घटवासी
दुष्ट सकल नित मोहे सतावे , भ्रमत रहे मोहे चैन न आवे जय गिरिजापति...
त्राहि त्राहि में नाथ पुकारौ , यही अवसर मोहि आन उबारो
मात पिता भ्राता सब होई , संकट में पुछत नही कोई
स्वामी एक है आस तुम्हारी , आए हरो मम संकट भारी
धन निर्धन को देत सदाही , जो कोई जाचे सो फल पाहि जय गिरिजापति...
स्तुति केही विधि करो तुम्हारो , छमहु नाथ अब चुक हमारी
शंकर हों संकट के नाशन , विध्न विनाशन मंगल कारन
योगी यथि मुनि ध्यान लगाये , नारद शारद शीश नवावे
नमो नमो जय नमः शिवाये , सुर ब्रम्हादिक पार न पाए जय गिरिजापति...
जो यह पाठ करे मन लाइ , ता पर होत है शम्भू सहाई
ऋनियाजो कोई हों अधिकारी , पाठ करे सो पावन हारी
पुत्र होन कर इछा कोई , निश्चय शिव प्रसाद तेही होई
पंडित त्रियोदशी को लावे , ध्यान पूर्वक होम करावे जय गिरिजापति...
त्रियोदशी व्रत करे हमेशा , तन नही ताके रहे कलेशा
शंकर सम्मुख पाठ सुनाये , मन कर्म वचन ध्यान जो लावे
जनम जनम के पाप नसावे , अंत धाम शिवपुर में पावे
कहत अयोध्या आस तुम्हारी , जान सकल दुःख हरो हमारी जय गिरिजापति...
दोहा : नित्य नेम कर प्रात ही , पाठ करो चालीस
तुम मेरी मनोकामना , पूर्ण करो जगदीश
मगसर छटि हेमंत ऋतू , संवत चौसठ जान
स्तुति चालीसा शिवही , पूर्ण कीन कल्याण
उमापति महादेव की जय
सियावर राम चन्द्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय
राधे प्रिये कृष्ण चन्द्र की जय
सनातन धरम की जय जय
बोलो भाई सब संतान की जय
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